
Ashtavakra Gita Bhashya Prakaran (11) (Hindi)
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अष्टावक्र गीता अद्वैत वेदांत के शिखर-ग्रंथों में से एक है, जिसमें मुमुक्षु राजा जनक और युवा ऋषि अष्टावक्र के बीच हुए गहन संवाद का वर्णन है। यहाँ 'नेति-नेति' कोई सिद्धांत नहीं, एक सीधी चोट है: जो असत्य है, उसे नकारते चलो, ताकि सत्य स्वयं प्रकट हो सके।
दसवें प्रकरण में जहाँ बाहरी विषयों के प्रति तृष्णा के त्याग पर बल दिया गया था, इस शृंखला के ग्यारहवें प्रकरण में ऋषि अष्टावक्र राजा जनक को 'आत्मज्ञान' के उस शिखर पर ले जाते हैं जहाँ मुमुक्षु प्रकृति के विषयों के परिवर्तनकारी स्वभाव को देख पाता है। दुख का मूल कारण स्वयं संसार नहीं, बल्कि उसके प्रति होने वाली 'चिंता' या मानसिक प्रलाप है। जब संसार में भाव (होना), विकार (परिवर्तन), और अभाव (न होना) की स्वाभाविकता दिखाई देने लगती है, तो मन की लगातार चलने वाली अनिवार्य बयानबाज़ी गिर जाती है।
प्रस्तुत पुस्तक आपको किसी "नई उपलब्धि" की ओर नहीं, जीवन के अनावश्यक बोझ को उतारने की ओर ले जाती है। पुस्तक स्पष्ट करती है: जो बदलता है, वही प्रकृति है, और उसका बदलना स्वभाव है। पुस्तक की सहज संगति से जैसे-जैसे यह बोध गहराता है, मन को हर बदलाव पर टिप्पणी करने, डरने, बचाने की मजबूरी कम होती जाती है। शांति किसी खास परिस्थिति की शर्त नहीं, बल्कि विशुद्ध आत्मज्ञान की स्वाभाविक परिणति बन जाती है।
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