
Tao Te Ching Bhag - 2 (Hindi)
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दो सहस्राब्दियों से अधिक पुराना होने पर भी ताओ ते चिंग आज भी मनुष्य के जीवन को देखने की एक विरल दृष्टि देता है। इसकी विशेषता यह है कि यह बात को सीधे उपदेश की तरह नहीं, बल्कि ऐसे सूत्रों में कहता है जो हमारी जमी हुई धारणाओं को हिला देते हैं। कहीं खालीपन को शक्ति कहा गया है, कहीं पीछे रहने को श्रेष्ठता, और कहीं जल की तरह सरल, विनम्र और जीवनदायी होने की बात की गई है। यह ग्रंथ मनुष्य को अधिक सहज, अधिक सरल और कम बोझ लेकर जीने की दिशा देता है।
प्रस्तुत पुस्तक आचार्य प्रशांत द्वारा ताओ ते चिंग की व्याख्या पर आधारित शृंखला की दूसरी कड़ी है, जिसमें अध्याय चार से आठ तक के सूत्र संकलित हैं। पुस्तक में आचार्य प्रशांत द्वारा की गई व्याख्या इन गूढ़ सूत्रों को आज के संदर्भ में जीवंत कर देती है। इन व्याख्याओं का केंद्रीय सूत्र है: हम जिन संबंधों, सफलता, मान-सम्मान, अपनी मान्यताओं और सुरक्षा के सहारे स्वयं को पूरा करना चाहते हैं, उन्हीं से बँध भी जाते हैं। आचार्य प्रशांत दिखाते हैं कि भीतर की स्वतंत्रता वहीं से शुरू होती है जहाँ यह पकड़ ढीली पड़नी शुरू होती है। यहाँ ताओ का "खालीपन" किसी धुँधले रहस्य का नाम नहीं, बल्कि उन झूठे सहारों से मुक्त होने की दशा है जिनसे चिपककर मन स्वयं को और अधिक दुर्बल बनाता है।
यह पुस्तक उन पाठकों के लिए है जो जीवन को भय, चिपकाव और सहारे की आदत से नहीं, बल्कि अधिक स्पष्टता, सरलता और आंतरिक बल के साथ जीना चाहते हैं। जो ताकत जोड़ते जाने से नहीं, बल्कि अनावश्यक बोझ छोड़ने से आती है, उसी की ओर यह पुस्तक एक शांत पर गहरा संकेत करती है।
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