Durga

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Unabridged

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दुर्गा

लेखक: धर्मराज यादव

जब किसी साम्राज्य की नींव भय पर टिकी हो, तो उसे गिराने के लिए तलवार से पहले साहस की आवश्यकता होती है।

पहाड़ों और दूरस्थ घाटियों के बीच, एक ऐसा समय जन्म ले चुका है जहाँ लोग डर में जीना सीख चुके हैं। महिष का नाम ही लोगों के दिलों में सन्नाटा भर देता है। उसका साम्राज्य केवल सेना और शक्ति से नहीं, बल्कि लोगों के मन में बसे भय से चलता है।

लेकिन हर अंधकार के भीतर कहीं न कहीं एक चिंगारी जन्म लेती है।

दुर्गा उसी चिंगारी का नाम है।

अकेली, घायल और अतीत के बोझ से भरी हुई, दुर्गा की यात्रा एक साधारण स्त्री से उस शक्ति तक पहुँचने की कहानी है जो डर के साम्राज्य को चुनौती देती है। इस रास्ते में उसे मिलती हैं ऐसी स्त्रियाँ जो स्वयं अपने भीतर युद्ध लड़ चुकी हैं-मीनाक्षी, जिसकी शांत आँखों में असाधारण दृढ़ता छुपी है; गंगी, जिसे दुनिया "विष-कन्या" कहती है; तारा, जो शब्दों से ज्यादा मौन को समझती है; और नूमा, पहाड़ों की वह बेटी जिसकी आत्मा बर्फ़ की तरह कठोर और आग की तरह जीवित है।

ये कोई सेना नहीं हैं।

ये वे स्त्रियाँ हैं जिन्हें दुनिया ने कभी महत्व नहीं दिया-लेकिन जिनके भीतर परिवर्तन की सबसे बड़ी शक्ति छिपी है।

दुर्गा जानती है कि महिष को हराने के लिए केवल युद्ध पर्याप्त नहीं होगा। उसे उसके साम्राज्य की जड़ों तक पहुँचना होगा-उस भय तक, जिसने लोगों को झुकने पर मजबूर कर दिया है।

और जब भय टूटता है, तो साम्राज्य स्वयं ढहने लगते हैं।

"दुर्गा" केवल एक युद्ध की कहानी नहीं है।

यह साहस, प्रतिरोध और पुनर्जन्म की कथा है-उस क्षण की, जब एक स्त्री यह तय करती है कि अब इतिहास डर से नहीं लिखा जाएगा।

यह कहानी है उस आग की, जो चुपचाप जलती है…

और फिर एक दिन पूरी दुनिया को रोशनी दे देती है।